कभी दिल्ली को समझने के लिए सिर्फ उसके किलों और महलों को देखना काफी नहीं था। शहर को समझने के लिए उसके नक्शे देखने पड़ते थे।
पुराने नक्शे खोलिए तो एक ऐसी दिल्ली सामने आती है, जिसे आज पहचानना भी मुश्किल है। जिस जगह आज चौड़ी सड़कें, सरकारी इमारतें, बाजार और ऊंची इमारतें दिखाई देती हैं, वहीं कभी गांव थे। कहीं तालाब थे, कहीं बाग थे, कहीं दलदली जमीन थी और कहीं यमुना का पानी शहर के बेहद करीब तक आता था।
दिल्ली की कहानी सिर्फ सात बार बसने और उजड़ने की कहानी नहीं है। यह लगातार बदलते हुए भूगोल की भी कहानी है।
और इस कहानी को समझने का सबसे दिलचस्प तरीका है—पुराने नक्शों में दिल्ली को देखना।
दिल्ली अभिलेखागार के पास आज भी पुराने नक्शों और कार्टोग्राफिक रिकॉर्ड का बड़ा संग्रह है। विभाग के रिकॉर्ड में 1836 से 1960 तक के Deputy Commissioner Maps और 1858 से 1942 तक के Commissioner Maps जैसी सामग्री दर्ज है। यानी दिल्ली को बदलते हुए देखने के लिए हमारे पास सिर्फ किस्से नहीं, बल्कि नक्शों का दस्तावेजी इतिहास भी मौजूद है।
एक नक्शा खोलिए और दिल्ली बदल जाएगी
आज अगर कोई व्यक्ति दिल्ली का नक्शा देखे तो उसे सड़कों, मेट्रो लाइनों, कॉलोनियों और फ्लाईओवरों का जाल दिखाई देता है।
लेकिन पुराने नक्शे में यही शहर अलग भाषा बोलता है।
वहाँ शहर के बीच-बीच में गांव, बाग, तालाब, नहरें, जल निकासी के रास्ते और खाली जमीन दिखाई देती है। हाल के वर्षों में दिल्ली के पुराने नक्शों पर हुए शोध और प्रदर्शनियों ने भी यह दिखाया है कि 19वीं और 20वीं सदी की दिल्ली आज की तुलना में कहीं अधिक हरित और जल-समृद्ध थी। 1807 से 1984 तक के नक्शों की तुलना में यमुना के आसपास के परिदृश्य, wetlands और drainage systems में बड़े बदलाव दिखाई देते हैं।
यानी नक्शा सिर्फ यह नहीं बताता कि सड़क कहाँ थी।
वह यह भी बताता है कि शहर ने प्रकृति के साथ कैसा रिश्ता रखा था।
नई दिल्ली बनने से पहले यहाँ क्या था?
यह सवाल शायद इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।
आज जहाँ हमें राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट, कनॉट प्लेस और चौड़ी सरकारी सड़कें दिखाई देती हैं, वहाँ नई दिल्ली बनने से पहले अलग-अलग गांव और ग्रामीण भू-दृश्य मौजूद थे।
20वीं सदी के शुरुआती नक्शों में इस इलाके की तस्वीर आज से काफी अलग दिखाई देती है। एक पुराने नक्शे से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, 1912 के आसपास के नक्शों में ऐसे गांव और प्राकृतिक क्षेत्र दर्ज थे, जिनकी जगह बाद में नई दिल्ली के नियोजित शहर ने ले ली। 1928 के नक्शे तक आते-आते नई राजधानी का निर्माण स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा था। कनॉट प्लेस का क्षेत्र भी उस समय पुराने ग्रामीण और बाजार क्षेत्र के आसपास विकसित हो रहा था।
सोचिए—
आज जिस कनॉट प्लेस में हजारों लोग खरीदारी करते हैं, कभी उसके आसपास की जमीन आज जैसी शहरी नहीं थी।
यही दिल्ली की सबसे दिलचस्प बात है।
शहर अचानक नहीं बना। उसने धीरे-धीरे अपने पुराने भू-दृश्य को ढक दिया।
दिल्ली की यमुना भी आज जैसी नहीं थी
आज यमुना को देखते हुए शायद ही कोई कल्पना कर पाए कि कभी इसका आसपास का पूरा landscape अलग तरह का था।
पुराने नक्शे नदी के साथ जुड़े जल क्षेत्रों, wetlands और drainage channels की तस्वीर देते हैं। समय के साथ शहर का विस्तार हुआ, नदी के किनारे निर्माण बढ़ा और प्राकृतिक जल-तंत्र में बदलाव आया।
हालिया INTACH प्रदर्शनी में 1807 से 1984 तक के पुराने नक्शों के जरिए दिल्ली के बदलते landscape को दिखाया गया। इनमें यमुना के course में बदलाव, गायब होते wetlands और पुराने drainage systems जैसी चीजें सामने आईं।
यानी आज जिस दिल्ली में बारिश के बाद कई इलाकों में पानी भरने की समस्या दिखाई देती है, उसके पीछे सिर्फ आधुनिक बारिश या drainage की कमी की कहानी नहीं है।
पुराने नक्शे यह सवाल भी पूछते हैं कि हमने शहर बनाते समय प्राकृतिक पानी के रास्तों के साथ क्या किया?
जो तालाब नक्शे में थे, आज कहाँ हैं?
पुराने नक्शों को पढ़ते समय सबसे ज्यादा चौंकाने वाली चीजों में से एक है—पानी।
आज दिल्ली को एक बेहद घनी आबादी वाला महानगर समझा जाता है, लेकिन पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि शहर के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में तालाब और जलाशय मौजूद थे।
1997-98 के उपलब्ध आंकड़ों और बाद के अध्ययन में दिल्ली के 44 lakes और 355 ponds दर्ज किए गए थे। INTACH की एक रिपोर्ट के अनुसार, बाद के वर्षों में कई जलाशय गायब हो गए या उनके आसपास का प्राकृतिक catchment क्षेत्र बदल गया।
इसका मतलब यह नहीं कि हर पुराना तालाब केवल शहर के निर्माण के कारण ही गायब हुआ। कुछ सूखे, कुछ अतिक्रमण की चपेट में आए और कुछ के आसपास का प्राकृतिक drainage बदल गया।
लेकिन पुराने नक्शे एक महत्वपूर्ण बात जरूर दिखाते हैं—
दिल्ली कभी पानी से इतनी खाली नहीं थी, जितनी आज दिखाई देती है।
1932 का एक नक्शा और गायब हो चुकी झील
इस कहानी का सबसे दिलचस्प उदाहरण हाल के वर्षों में सामने आया।
INTACH के शोधकर्ताओं ने 1932 के एक पुराने नक्शे के आधार पर उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में भलस्वा झील के उत्तर की ओर एक लगभग दो मील लंबी ऐतिहासिक waterbody की पहचान की। वर्तमान में उस इलाके का बड़ा हिस्सा निर्मित हो चुका है, लेकिन जमीन का लगभग 10 एकड़ का depression अभी भी मौजूद बताया गया है।
अब सोचिए—
एक पुराना नक्शा सामने आता है।
उस पर एक जलाशय बना हुआ है।
आज उसी जगह पर शहर खड़ा है।
फिर शोधकर्ता पुराने नक्शे और जमीन के वर्तमान contours को मिलाते हैं और पता चलता है कि जमीन का आकार अभी भी उस पुराने पानी की कहानी को पूरी तरह भूल नहीं पाया है।
यही कारण है कि पुराने नक्शे सिर्फ इतिहास की किताब नहीं हैं।
कई बार वे भूली हुई चीजों को खोजने का सुराग भी बन जाते हैं।
दिल्ली के गायब गांव
पुरानी दिल्ली और नई दिल्ली की कहानी में गांवों की भूमिका अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है।
जब ब्रिटिश शासन के दौरान नई राजधानी की योजना बनाई गई, तो शहर का landscape तेजी से बदलने लगा। नई सड़कों, सरकारी भवनों और नियोजित क्षेत्रों के लिए जमीन का उपयोग बदला।
पुराने नक्शों में दर्ज कई गांव धीरे-धीरे बड़े शहरी ढांचे में समा गए।
कुछ गांवों के नाम आज भी किसी इलाके, सड़क या प्रशासनिक रिकॉर्ड में बचे हुए हैं, लेकिन उनका पुराना भू-दृश्य गायब हो चुका है।
यही वजह है कि दिल्ली के किसी पुराने इलाके का नाम पढ़ते समय कभी-कभी लगता है कि यह नाम अचानक कहाँ से आया।
असल में वह नाम शायद उस गांव की आखिरी याद हो, जो शहर में कहीं खो चुका है।
दिल्ली सिर्फ इमारतों से नहीं बनी
हम जब दिल्ली का इतिहास पढ़ते हैं तो अक्सर शासकों और इमारतों पर ध्यान देते हैं।
मुगल आए।
अंग्रेज आए।
नई दिल्ली बनी।
भारत स्वतंत्र हुआ।
लेकिन एक दूसरा इतिहास भी चलता रहा—
जमीन का इतिहास।
कहाँ पानी जमा होता था?
कहाँ खेती होती थी?
कहाँ जंगल था?
कहाँ गांव था?
किस रास्ते से लोग शहर में आते थे?
कहाँ बाजार लगता था?
और किस जगह पर नई सड़क बनने के बाद पुराना रास्ता हमेशा के लिए खत्म हो गया?
पुराने नक्शे इन सवालों का जवाब देने में मदद करते हैं।
एक शहर के बदलने की सबसे बड़ी तस्वीर
दिल्ली अभिलेखागार का महत्व इसी वजह से और बढ़ जाता है। दिल्ली सरकार का अभिलेखागार पुराने दस्तावेजों, नक्शों, तस्वीरों, पांडुलिपियों और पुस्तकों को संरक्षित करता है। विभाग के अनुसार, इसका उद्देश्य दिल्ली की archival heritage को सुरक्षित रखना है।
वहाँ मौजूद cartographic records हमें यह समझने में मदद करते हैं कि दिल्ली एक ही जगह पर खड़ा हुआ स्थिर शहर नहीं है।
यह लगातार बदलता हुआ शहर है।
एक नक्शे में गांव दिखाई देता है।
दूसरे में सड़क।
तीसरे में सरकारी इमारत।
और कुछ दशक बाद उसी जगह पर एक पूरी तरह नया इलाका।
यानी दिल्ली का नक्शा वास्तव में शहर की उम्र का टाइमलाइन है।
पुराने नक्शे आज हमारे लिए क्यों जरूरी हैं?
शायद सबसे बड़ा सवाल यही है।
इतने पुराने नक्शों को देखकर आज हमें क्या मिलेगा?
इसका जवाब सिर्फ इतिहास नहीं है।
पुराने नक्शे आज के शहर की कई समस्याओं को समझने में मदद कर सकते हैं।
अगर किसी पुराने नक्शे में कोई तालाब दर्ज है और आज वहाँ पानी भरता है, तो वह संयोग मात्र नहीं भी हो सकता।
अगर पुराने नक्शे में कोई drainage channel दिखाई देता है और आज उसी इलाके में बारिश का पानी रुकता है, तो पुराने भूगोल को समझना उपयोगी हो सकता है।
अगर किसी पुराने map में जंगल, wetland या open land दर्ज है, तो वह आज की urban planning के लिए भी महत्वपूर्ण जानकारी हो सकती है।
हालिया map-based heritage research इसी वजह से सिर्फ अतीत को देखने का तरीका नहीं है; इसे भविष्य की conservation planning के लिए भी उपयोगी माना जा रहा है।
दिल्ली का सबसे बड़ा रहस्य शायद जमीन के नीचे नहीं, नक्शे पर है
दिल्ली के बारे में रहस्यमयी कहानियाँ सुनते ही हमारे दिमाग में सुरंगें, पुराने किले और बंद कमरे आते हैं।
लेकिन दिल्ली का एक और रहस्य हमारे सामने खुलेआम पड़ा है।
वह है—पुराने नक्शे।
उनमें एक ऐसी दिल्ली छिपी है जिसे हमारी पीढ़ी ने देखा ही नहीं।
एक ऐसी दिल्ली जहाँ शहर और गांव एक-दूसरे के करीब थे।
जहाँ पानी के रास्ते नक्शे पर साफ दिखाई देते थे।
जहाँ बाग और खुले क्षेत्र शहर का हिस्सा थे।
जहाँ आज की कई प्रमुख सड़कों के स्थान पर बिल्कुल अलग रास्ते मौजूद थे।
और जहाँ नई दिल्ली बनने से पहले राजधानी का landscape किसी planned metropolis से ज्यादा एक जीवित, ग्रामीण और प्राकृतिक भूगोल जैसा दिखाई देता था।
आज की दिल्ली को पुराने नक्शे से देखिए
अगली बार जब आप दिल्ली में कहीं जाएँ, तो सिर्फ यह मत सोचिए कि “यह जगह आज कैसी है?”
एक बार यह भी सोचिए—
“100 या 200 साल पहले यहाँ क्या रहा होगा?”
शायद आपके पैरों के नीचे कभी कोई तालाब रहा हो।
शायद सामने की सड़क कभी किसी गांव का रास्ता रही हो।
शायद जिस इलाके में आज हजारों लोग रहते हैं, वहाँ कभी खेत या बाग रहा हो।
और शायद किसी पुराने नक्शे के एक कोने में उस जगह का नाम आज भी दर्ज हो।
यही दिल्ली की असली खूबसूरती है।
यह शहर अपनी पुरानी परतों को पूरी तरह मिटाता नहीं।
वह उन्हें नामों, रास्तों, स्मारकों, तालाबों और नक्शों में कहीं न कहीं छिपाकर रख देता है।
इसलिए दिल्ली को जानना है तो सिर्फ उसके किलों को मत देखिए।
कभी एक पुराना नक्शा भी खोलिए।
क्योंकि हो सकता है, उस नक्शे में आपको वह दिल्ली मिल जाए जो आज शहर में दिखाई नहीं देती।
निष्कर्ष
“पुराने नक्शों में खोई हुई दिल्ली” दरअसल किसी एक पुराने नक्शे की कहानी नहीं है। यह उस शहर की कहानी है जो सदियों से अपने आकार, पानी, रास्तों, गांवों और हरियाली को बदलता आया है।
आज की दिल्ली तेज है, घनी है और लगातार फैल रही है। लेकिन उसके नीचे और उसके आसपास एक पुरानी दिल्ली अब भी मौजूद है—कभी किसी मोहल्ले के नाम में, कभी किसी सूखे तालाब के निशान में, कभी किसी गांव की पुरानी सीमा में और कभी किसी धूल भरे नक्शे की पतली-सी रेखा में।
शायद इसी वजह से दिल्ली को समझने का सबसे अच्छा तरीका सिर्फ पीछे मुड़कर देखना नहीं है।
कभी-कभी ऊपर से नीचे देखना पड़ता है—एक पुराने नक्शे पर।